वन अधिकार कानून 2006 को हिमाचल प्रदेश में जिस गति से लागू करने की जरूरत थी, उस पर पिछले 18 वर्षों में ज्यादा काम नहीं हुआ है

वन अधिकार कानून 2006 को हिमाचल प्रदेश में जिस गति से लागू करने की जरूरत थी, उस पर पिछले 18 वर्षों में ज्यादा काम नहीं हुआ है

हिमाचल किसान सभा तथा सेब उत्पादक संघ की मंडी व कुल्लू जिला कमेटियों का एक प्रतिनिधिमंडल किसान सभा के राज्य उपाध्यक्ष एवं जिला परिषद सदस्य कुशाल भारद्वाज, सहसचिव नारायण चौहान, सेब उत्पादक संघ के राज्य सचिव एवं जिला परिषद सदस्य पूर्ण ठाकुर, सह सचिव महेंद्र राणा के नेतृत्व में मंडी के संस्कृति सदन में राजस्व, वन व जनजातीय विकास मंत्री जगत सिंह नेगी से मिला तथा उन्हें बेदखली रोकने और इससे संबन्धित मुद्दों एवं अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 को लागू करने बारे ज्ञापन सौंपा। इस प्रतिनिधिमंडल में मंडी जिला से किसान सभा के उपाध्यक्ष जोगिंदर वालिया, प्रेम चौधरी, बिहारी लाल, नंद लाल वर्मा, रविंदर राणा, दिनेश काकू, यदुनंदन राय, नरेश धरवाल, हरि सिंह, ओम
कुल्लू जिला से गुरजीत गिल, गोविंद भंडारी, अनिल कुमार भी साथ थे

इस बारे जानकारी देते हुए किसान सभा राज्य उपाध्यक्ष कुशाल भारद्वाज ने कहा कि
वन अधिकार कानून 2006 को हिमाचल प्रदेश में जिस गति से लागू करने की जरूरत थी, उस पर पिछले 18 वर्षों में ज्यादा काम नहीं हुआ है। अधिकांश जगह वन अधिकार कमेटियाँ बनी तो हैं, लेकिन अधिकांश कमेटी सदस्यों को पता ही नहीं है कि वे भी इन कमेटियों में है। यदि किसी को पता भी है तो उनको यही नहीं पता कि इन कमेटियों ने करना क्या है और अधकांश कमेटियों की बैठकें भी नहीं होती हैं। कुछ जगह इस कानून के तहत मालिकाना हक हासिल करने के लिए क्लेम दाखिल भी किए गए हैं, लेकिन प्रशासनिक ढील के चलते प्रस्तुत किए गए दावों एवं कब्जों को मालिकाना पट्टे नहीं दिये गए हैं। उन्होंने कहा कि हिमाचल प्रदेश में 67 प्रतिशत वन भूमि है और हमार पूर्वज घुमंतू और वनवासी थे। इसके बावजूद अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी(वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 के प्रावधानों को विभिन्न सरकारी विभागों द्वारा लागू नहीं किया जा रहा है।

किसान सभा व सेब उत्पादक संघ ने मांग की कि वनाधिकार अधिनियम के तहत उपयुक्त अधकारियों को अधिनियम के तहत किसानों द्वारा किए गए सभी दावों को स्वीकार करने का निर्देश दिया जाये और सरकार द्वारा मासिक आधार पर निगरानी की जाये। वन अधिकार कमेटियों का पुनर्गठन किया जाये और उन्हें सक्रिय किया जाये। वन अधिकार कानून को लागू करवाने हेतु ग्राम सभाओं की निरंतर बैठकें सुनिश्चित की जाएँ। सभी भूमिहीन व्यक्तियों को सरकार की नीति के अनुसार ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में क्रमशः दो और तीन बिसवा भूमि प्रदान की जाये और जब तक उन्हें उपयुक्त भूमि आबंटन नहीं की जाती है, तब तक उनके आवास से उन्हें बेदखल न किया जाये और 2023 की प्राकृतिक आपदा में जिनके घर नष्ट हो गए हैं, उन्हें 7 लाख रूपये प्रदान करने का विशेष पैकेज उन लोगों को भी दिया जाये, जिन्होंने गैर-म्यूटेटेड नौतोड़ भूमि पर अपने घर बनाए हैं।

उन्होंने कहा कि जब तक भारत का सर्वोच्च न्यायालय नीता राम बनाम हिमाचल प्रदेश राज्य आर अन्य मामले में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय, शिमला द्वारा पारित सीडबल्यूपी संख्या 207/2018 में दिनांक 17.09.2024 के अंतिम निर्णय और आदेश दिनांक 17.09.2024 से उत्पन्न विशेष अवकाश याचिका (सिविल) डायरी संख्या (एस) 45933/ 2024 में दिये गए आदेश के अनुसार एक बड़ी पीठ का गठन नहीं करता है, तब तक सभी बेदखली रोक दी जाये। इसके लिए केंद्र सरकार से 1980 के वन संरक्षण अधिनियम में उचित संशोधन करने का अनुरोध किया जाए। भूमिहीन और गरीब किसानों को कम से कम 5 बीघा भूमि दी जाए और नियमित की जाये।

भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के अनुसार किसानों को उनकी अधिग्रहित भूमि का 4 गुणामुआवजा दिया जाये। 2019 के बाद घटाए गए सर्कल रेट को खारिज करके अपडेट किया जाए।
भूमिहीनों और छोटे किसानों को विभिन्न योजनाओं के तहत दी गई सभी नौतोड़ भूमि का विशेष म्यूटेशन किया जाये, जिसकी किसी न किसी कारण से म्यूटेशन नहीं हो सकी है।
कुशाल भारद्वाज

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