हिमाचल प्रदेश में इतिहास में पहली बार सत्तारूढ़
राजनितिक दल ने अपने 6 सदस्यों को विधानसभा की सदयस्ता से अयोग्य किया है। लिहाजा, राज्य के 6 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव का मार्ग प्रशस्त हो गया है। वीरवार सुबह विधानसभा अध्यक्ष कुलदीप सिंह पठानिया ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि व्हिप के उल्लंघन पर 6 विधायकों की सदस्यता रद्द की गई है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आदेश जारी किये गए हैं। बता दे कि हिमाचल के राजनीतिक इतिहास में ऐसा घटनाक्रम पहले नहीं हुआ।
कांग्रेस के पर्यवेक्षक हरियाणा के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा,कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार व पूर्व सीएम भूपेश बघेल भी शिमला पहुंच गए थे, उन्होंने कांग्रेस के मंत्रियों व विधायकों से अलग-अलग मुलाकात की। 6 बागी विधायकों को सदस्यता रद्द करने को लेकर कांग्रेस एकजुट दिखी,यहां तक की विक्रमादित्य सिंह ने शाम तक इस्तीफे को वापस ले लिया था।
लोकसभा चुनाव की दहलीज पर कांग्रेस ने 6 विधायकों को बाहर का रास्ता दिखाकर पार्टी के अनुशासन को लेकर कड़े संकेत दिए हैं। देखना ये भी होगा कि क्या अब भाजपा उप चुनाव में कांग्रेस के बागियों को टिकट दे सकेगी या नहीं, क्योंकि भाजपा के समक्ष उन नेताओं की चुनौती भी होगी, जिन्हे हराकर कांग्रेस के बागी विधानसभा में पहुंचे थे।
बीजेपी में रहे राजेंद्र राणा पूर्व सीएम व केंद्रीय सूचना प्रसारण मंत्री प्रेम कुमार धूमल के शिष्य रहे। एक वक्त था जब धूमल का चुनाव प्रबंधन की जिम्मेदारी राणा संभालते थे। लेकिन,गुरु व चेले में तलवारें खिंच गई। चुनाव जीतने के बाद महत्वाकांक्षा ये रही होगी कि कैबिनेट मंत्री बनाया जाये। अब सवाल ये उठता है कि सदस्यता रद्द होने के बाद क्या भाजपा उन्हें टिकट देगी। क्योंकि राणा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को ऐसे जख्म दिए थे जिस कारण भाजपा ने सीएम की कुर्सी को खो दिया था सरकार बनने के बाद 6 बार के मुख्यमंत्री रहे दिवंगत वीरभद्र सिंह की भी गुड बुक्स में रहने वाले सुधीर शर्मा का मंत्री बनना लगभग तय माना जा रहा था। लेकिन जब उन्हें मंत्री पद नहीं मिला तो कई बार वह अपनी ही सरकार के खिलाफ भी बयानबाजी करते नजर आए। उप चुनाव में हार की आशंका को देखते हुए सुधीर ने चुनाव लड़ने से इंकार किया है।
चुनाव में जीत की हैट्रिक लगाने वाले आईडी लखनपाल की पहचान कांग्रेस में इस कारण होती है, क्योंकि वो भाजपा के गढ़ से चुनाव जीतते रहे। ऐसे में उनके बगावती सुर अपनाना हर किसी को हैरान कर रहा है। निश्चित तौर पर तीसरी बार चुनाव जीतने के बावजूद भी अहम ओहदा न मिलने से आईडी लखनपाल भी निराश होंगे।
हिमाचल विधानसभा के सबसे युवा विधायक चैतन्य शर्मा उत्तराखंड के पूर्व मुख्य सचिव राकेश शर्मा के सुपुत्र है। उच्च शिक्षित चैतन्य शर्मा ने पहली बार ही चुनाव लड़ा था और जीतकर विधानसभा भी पहुंचे थे। चैतन्य शर्मा के बागी सुर अपनाने के पीछे का कारण अनदेखी और उनके निर्वाचन क्षेत्र में विकास कार्यों में धीमी गति को बताया जा रहा है। जानकार ये भी बताते है कि चैतन्य शर्मा हर हाल में चुनाव लड़ना चाहते थे ऐसे में अगर उन्हें भाजपा भी चुनाव में टिकट देती तो वह भाजपा के टिकट पर भी चुनाव लड़ सकते थे। वहीं राजनीति में अनुभव की कमी और परिपक्वता न होना भी उनका पार्टी के खिलाफ बागी सुर अपनाने का कारण माना जा रहा है।
लाहौल स्पीति से दो बार विधायक रह चुके रवि ठाकुर ने भी बगावती सुर अपनाए है। इसका सबसे बड़ा बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि उन्हें जनजातीय मंत्री का पद नहीं दिया गया। इस बात पर किन्नौर के विधायक व वरिष्ठ नेता जगत सिंह नेगी की ताजपोशी की गई। लेकिन जब उनकी मांग को पूरा नहीं किया गया तो वह सरकार के खिलाफ भी बोलते नजर आए।
32 साल के बाद कुटलैहड़ विधानसभा क्षेत्र में को कांग्रेस की झोली में डालने वाले देवेन्द्र कुमार भुट्टो के बगावती सुर से हर कोई हैरान है। हालांकि उन्होंने 2017 में भाजपा को छोड़कर ही कांग्रेस का दामन थामा था। उनकी बगावत का सबसे बड़ा कारण उनकी भाजपा से नजदीकियां को माना जा रहा है। कांग्रेस में आने से पहले वह 25 साल तक भाजपा में रह चुके थे।
